कोलकाता: लंबे समय से बंद पड़ी बंगाल की पारंपरिक संस्कृत टोल परीक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित करने की दिशा में श्री श्री ओंकारनाथदेव वैदिक विद्यापीठ की पहल अब ठोस रूप लेती दिख रही है। लगातार तीसरे वर्ष इस प्रतिष्ठान ने सफलतापूर्वक संस्कृत टोल परीक्षा का आयोजन कर यह साबित किया है कि शास्त्रीय शिक्षा के प्रति रुचि आज भी समाप्त नहीं हुई है। शिक्षाविदों के अनुसार, यह प्रयास संस्कृत शिक्षा के पुनरुत्थान की दिशा में एक अहम कदम है।
20 और 21 दिसंबर को महामिलन मठ में आयोजित इस परीक्षा में पश्चिम बंगाल के विभिन्न टोल, चतुष्पाठी, स्कूल और कॉलेजों से लगभग दो सौ से अधिक छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। यह जानकारी देते हुए डॉ. सुरेश कुमार बनर्जी, पूर्व वाइस प्रिंसिपल, श्री सीताराम वैदिक आदर्श संस्कृत महाविद्यालय ने कहा कि वर्षों बाद टोल परीक्षा के प्रति छात्रों का यह उत्साह भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है।
विद्यापीठ के पदाधिकारियों के अनुसार, यह संपूर्ण पहल ठाकुर सीतारामदास ओंकारनाथदेव के आदर्श वाक्य— “भूतले संस्कृत भाषा का हो प्रचार”—से प्रेरित है। उद्देश्य केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं, बल्कि पारंपरिक संस्कृत शिक्षा को संस्थागत मान्यता और निरंतरता प्रदान करना है। इसी क्रम में विद्यापीठ के वैदिक गुरुकुल में संस्कृत अध्ययन के साथ-साथ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—चारों वेदों का विधिवत अध्ययन भी प्रारंभ किया गया है।
इस दूरदर्शी योजना की नींव अतीत में अखिल भारत जयगुरु संप्रदाय के तत्कालीन सर्वोच्च आचार्य किंकर महिमानंद के मार्गदर्शन में रखी गई थी। पद्मश्री डॉ. रमरणजन मुखोपाध्याय, डॉ. गोपाल मित्र, आचार्य ध्यानेश नारायण चक्रवर्ती और पंडित नित्यानंद स्मृतितीर्थ जैसे विद्वानों ने इस पहल को दिशा दी। वर्तमान में संप्रदाय के सर्वोच्च आचार्य किंकर बिट्ठल रामानुज की प्रेरणा तथा विद्यापीठ के सेक्रेटरी और डायरेक्टर डॉ. शोभन कुमार भट्टाचार्य के नेतृत्व में यह प्रयास और अधिक सशक्त हुआ है।
इस वर्ष की परीक्षा में वेद, व्याकरण और संस्कृत साहित्य सहित कुल आठ विषयों का मूल्यांकन किया गया। साधनचंद्र महाविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रोफेसर शुभदीप मुखोपाध्याय मानद ऑब्जर्वर के रूप में उपस्थित रहे। दूर-दराज से आए परीक्षार्थियों के लिए भोजन और आवास की समुचित व्यवस्था भी की गई थी।
परीक्षा के सफल आयोजन में विद्यापीठ के आचार्य अर्घ्य चक्रवर्ती, जन्मेजय आचार्य, अभिनंदन रे, रमन सिंह राय, डॉ. चंद्रबली गोस्वामी और डॉ. गंगाराणी साहू की विशेष भूमिका रही।
शिक्षा जगत का मानना है कि प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के बीच सेतु निर्माण का यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृत भाषा और साहित्य को फिर से प्रासंगिक बनाने में निर्णायक सिद्ध हो सकता है।